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Thriving Mindfully

Category: Hindi

नारी

किलकारी से आज मन का भर गया है झोला
देखो आज पालना भी झूम कर है डोला
आंगन में अब तो गूंजे है मद्धम सी लोरी
जो जन्मी है घर में अपने प्यारी सी छोरी

समय की करवट के साथ जन्मा भाई छोटा
नानी बन बिटिया झूमी जैसे हुआ हो उसका पोता
दूध के दांत भले टूटे नही हो पांच
रक्षा करे ऐसी भाई को आने ना दे आंच

थी उसके साये में कुछ ऐसी निर्मल छाया
पापा की डांट से मानो हर रोज़ ही बचाया
जो माँ की ममता अगर कभी पड गयी अधूरी
अम्मा बन हरदम की हर कसर है उसने पूरी

और भाई की मुठ्ठी में ताक़त कुछ ऐसी समाई
जो बहन की राखी से सज गयी उसकी कलाई
फ़िर भाई के रुतबे में लग जाता ऐसा तड़का
कि आंख उठाने से डरे मोहल्ले का हर लड़का

पर पलक झपकते ही देखो बड़ी हो गयी लाड़की
दुल्हन बन बैठी है आज, सज गयी है देखो पालकी
पीछे छोड़े अपने कई आँसुओं के अम्बार
ससुराल चली बन्नो बसाने अपना संसार

पापा बोले जा बिटिया रखना सबको हरदम ही ख़ुश
तू जन्मी थी तो ही उभरा था मेरे भीतर का पौरुष
तेरी ज़िद्द न होती ऐ बहना तो मैं पैदा न हुआ होता
बोला भाई, अब सूना हो गया देख तेरा नन्हा पोता

नारी की महिमा हैं यह, उसकी कोमल सी ममता
हर नर में परिवर्तन लाने की अद्भुत सी ये क्षमता
अगर ना होता नारी का वो निर्मल पावन प्यार
मानो ओझल हो जाता इस संसार का ही सार

हो धागों के ये रिश्ते या हो ममता के अटूट तार
इस प्रेम की पतवार से ही होती है नैया पार
नारी का अस्तित्व ही है मानो देवी का अवतार
आओ मिलकर इस शक्ति का करें हम जयजयकार

एक डोलता पहिया

आज अचानक मुझे वो बचपन याद आ गया
लगा मानो जैसे पलों में जीवन समा गया ,

थे वोह भी दिन भीगे मल्हार के
जब कपडे दो जोड़ी ; दोस्त हज़ार थे

एक लकड़ी, एक पंचर पहिये का था साथ
गरजते बादल थे , थी कुछ बूंदों की छांट

बस कोशिश नहीं करूंगा और याद करने की
बर्दाश्त की भी हद्द होती है
पिसती ख़ुशी की, रिसते ग़म की भी


बस घुटन में , चुभन में याद करता हूँ वोह पल सुहाना
कुछ ना चाहूं , चाहूं बस
आज को भुलाना, उस कल में घुल जाना |


और आज, इस बेसुरे से ट्रैफिक में फंसे हैं
वर्क प्रेशर ही होगा जो टायर तक की फूँक छूट गयी

स्क्रू जैक लगाये लंगड़ी गाडी है खड़ी
और सूट पहने खड़ा हूँ मैं, हाथ में पंचर पहिया लिए

बायें हाथ से फांसी के फंदे को ढील दी
इक लावारिस काठी ढूंढ़ लाया

और रास्ते पर मैं और इक डोलता पहिया
टशन में, तलाश में , आगे बढ़ते हैं

कि शायद कुछ दोस्त मिल जाएँ चलते चलते
कि शायद उस पार कुछ बारिश भी होगी …

कलयुग

ये कलयुग है ये कलयुग है यह रोना रोते नहीं थके

अपने पापों का बोझा हम जो ढ़ोते-ढ़ोते नहीं थके

इस भीड़ में भी रीढ़ कहाँ काणों में अंधे हैं राजा

जो स्वार्थ के तलवों तले हम सच कुचल बढ़ते चले



ये साधु सभी ये संत सभी क्यों आँखें मींचे बैठे हैं

मन-परिजन की पीड़ा पर क्यों पर्दे खींचे यह बैठे हैं

कलयुग के कोलाहल में अब करुणा की भी कौन सुने

ईमान की नीलामी से सिक्के हम ऐंठे बैठे हैं



कोई धोबी हो या धर्मराज, लत जुए की सबको है प्यारी

इस अंधकार की वर्षा में हम ढूँढ रहे हैं गिरधारी

नेत्रहीन नृप कईं हुए, देखे हमने धृतराष्ट्र कईं

पर न्याय की यह नायिका क्यों बन बैठी आज गांधारी?



चाहे कलयुग हो या हो त्रेता नारी का हर-पल हुआ हरण

हर राजभवन की छाया तले होता आया मर्यादा-मरण

चीर का एक छोर आज भी है हथेली में तेरी

ज़रा मन टटोल और खुद से पूछ, तू देव है या दैत्य है?



संकट है ये, विकट हैं ये, पर छोड़ना ना तू आशा

पिछले कर्मों पर क्या रोना, है व्यर्थ ये निष्कर्म निराशा

रौद्र राग को त्याग तू भज हौंसले की हंसध्वनि

है दृष्टिकोण का खेल सब चल बदलें कलयुग की परिभाषा



तू स्वयं में ही ढूँढ़ कृष्ण न मूरत को मान बैठ मुरारी

तेरे चित्त की चिंगारी से रोशन हो यह दुनिया अँधियारी

जो हर मानुष ढूँढ ले अपने भीतर दसवाँ अवतार

तो सत्त्व की सरस्वती से तृप्त होगी सृष्टि सारी

PHOTO by Pawan Sharma via Unsplash

इस रात की सुबह कहाँ?

उस शाम, हर बीती शाम की तरह

मैंने सोच को संजोए शाम बिताई
और उस जतन से ही मानो
कुछ सुंदर पंक्तियां उभर कर आयीं

मैंने शब्दों के इस संचय को कागज़ पर उतारा
और उस रात बेशक बड़ी मीठी नींद आई

सुबह हुई तो मैं मेज़ पर ही सोया हुआ था
और कागज़ पर मेरे मस्तक की लकीरें छपी थीं

सूरज चढ़ चुका था, नशा उतर चुका था
और कल की कविता अब कुछ फ़ीकी सी लगने लगी थी

मैंने हताशा में उस कागज़ को मसल कर गेंद बना दिया
और एक भावी रत्न को कूड़ेदान का स्थान दिखा दिया

विचारों के मंथन से कविताएँ हर रात उभर कर आती थी
पर नसीब ही उनका ऐसा
कि सुबह के प्रकाश,
पंक्तियों के प्रकाशन,
से वंचित रह जातीं

फ़िर एक दिन
मैंने मीनार पर चढ़े एक दीवाने को देखा

होगा नाश ज़िन्दगी का जो उसने कोई दायरा न देखा
ऐसी कोई भीड़ नहीं जिसमें उसने मुशायरा न देखा

और बस अंदाज़ में पिरो के शब्दों का पांसा जो उसने फेंका

कि बाज़ार में गूंज उठा मंज़र वाह-वही का
जैसे दीवाने की कविता हो पानी प्यासे राही का

शायद काव्य रस की तृष्णा मुझे उसके मंच तक खींच लायी
भीड़ में उसकी बुलंद आवाज़ मुझे दी सुनाई

पूरे जन-मंडल को कविता आयी बड़ी रास
पर उसकी पंक्तियों को सुनते ही हुआ विचित्र सा आभास

ये कविता मुझे न जाने क्यूं लगी जानी पहचानी
अरे! बेशक ये मेरी कविता है, जो इसने अपनी बना कर सुना डाली !

तालियों से तिलमिला कर मैं घर की ओर भागता चला गया
पहुंचते पहुंचते ही सूरज मद्धम सा ढलता चला गया

कमरे में पोहोंचा, पाया खाली उस भूखे कूड़ेदान को
जैसे हज़म कर बैठा हो मेरे कागज़ की गेंदों को

मैं रोया
फिर सिस्का
फ़िर होश संभाला
और मुस्कुराया

और मदिरा की शीशी को कूड़ेदान का मेहमान बनाया
कलम को थामे मैंने कुर्सी पर खुद को जमाया

और प्रण किया कि यह कलम तब तक चलती रहेगी
जब तक इस रात की सुबह नही होगी…

कागज़ की क़ैद

कागज़ पर खिंची सीधी लकीरें, सलाखों से कम नहीं

कैद हैं इस कारावास में न जाने कितनी कहानियाँ


सलाखें भी ऐसी कि आर-पार कोई सार ना दिखे

और पन्ना पलटें तो फिर कई सीधी लकीरें... 

कई क़ैद नज़्म...कई अनकही कहानियां...



कोरे कागज़, कोरी किताबें, क़ैद कई प्रश्नों के प्रेत

कब छूटेंगे प्राण इनके, कब सींचेगा कल्पना के खेत?



इस सवाल से जूझते हुए तू

कभी उम्मीद में, कभी हताशा में

उन सलाखों के परे छिपे शब्दों की पुकार ढूंढे

सन्नाटे में दूर कहीं जो मद्धम सी लोरी सुनाई पड़े...


जब तलक तेरी सोच झांक कर आज़ादी को ढूंढे

जब छलक कर उफ़ान मारे अभिव्यक्ति की बूंदें

तब कागज़ और कलम की नोक में घर्षण होगा मंद सा

चुप्पी के ताले तोड़े बोलेगा मन मलंग सा



हिचक की हिचकी से बेहतर आखिर

शब्द और स्याही की सरिता

बह जा इस पावन धारा में

 मुक्त कर हर कैद वो कविता


उठा कलम, रचते चला चल, 

मुक्त कर हर क़ैद कहानी

जो स्वर्ग समाए हर सर्ग में, 

अमर हो मानुष की वाणी...




 

एक दर्शन ऐसा भी !

अभी तो सवेरा हुए कुछ ही पल हुए थे
कि गुप्ता जी मंदिर की ऒर चढ़ावा लिए चल पड़े थे

दूर प्रांत से ज्ञानी बाबा आये थे नगर में
भक्तों का तांता लगा था मानो हर डगर में

दर्शन पाने को आतुर आये बाबा की पनाह में
थी कतार ऐसी लंबी पुराने मंदिर की राह में

पर इस मंगल अवसर पर गुप्ता जी ने देखा कुछ ऐसा
कि जैसे कामधेनु के बगल में खड़ा हो काला भैंसा !

गुप्ता जी ने देखा राह पर झाड़ू लगाता एक गरीब
बौखलाए सज्जन की मानो बाहर ही निकल आई जीभ

वो बोले,

सोच था होगा दिव्य मिलन, पर मिला ये झाडुवाला मलिन
इस कलमुहे को झाड़ू लगाना था क्या आज ही के दिन?

अपशगुन हाय अपशगुन, मेरी किस्मत ही है मारी
जो ढूंढता चला ब्रम्हा को और पल्ले पड़ी ये बीमारी

पावन इस अवसर का यह तो रायता फैला रहा है
जो झाड़ू लिए यह भिखारी धूल उड़ाता जा रहा है

इस तरह झाड़ू लगाने का भला कोई अर्थ है?
जो धूल तो कल फ़िर जमेगी, ये काम ही देखो व्यर्थ है !

अरे क्या दर्शन पाने का आखिर उचित है यह काल?
सोच बैठे गुप्ता जी रख कर मुँह पर रुमाल

फ़िर शंखनाद से प्रारंभ हुआ पावन सा प्रवचन
विचलित से शांत हुआ कुछ गुप्ता जी का मन

फ़िर घंटो तक बाबा बोले सभी दिव्य ग्रन्थों का सार
ब्रम्हा विष्णु महेश की लीलाएं अपरम्पार

ज्ञानी बाबा बोले

सैकड़ो बार यह सृष्टि बनी, और सैकड़ो बार नष्ट हुई
यह महिमा मण्डित प्रकृति भी धूल में ध्वस्त हुई

फ़िर उसी धूल से फूटे पुनः जीवन के यह नव अंकुर
फ़िर नारद बोले नारायण और छूटे संगीत के पहले सुर

और इसी तरह बारम्बार चलेगी सृष्टि की अद्भुत माया
यहां देवता भी सर्वनाश से मुक्त नहीं रह पाया

पर पुनः होगी रचना, होगा सृष्टि का नवसर्जन
तू काम में बस राम ढूँढ़, कर हर चिंता का विसर्जन

भावुक होकर गुप्ता जी ने कर तो दिया दंडवत प्रणाम
पर मन में शंका थी एक, भला पूछे कैसे सरेआम?

ख़ैर हिम्मत जुटा कर गुप्ता जी ने पूछा ही लिया

कि बाबाजी उत्पत्ति और विनाश का चक्र पल्ले पड़ता नहीं
जो सृष्टि का एक कण भी सर्वनाश से बचता नहीं

जो तांडव तले कुचलेगा सब तो क्यों रचा ब्रम्हा ने संसार
क्यों झेलते हैं ब्रम्हा बार बार, अपनी ही सृष्टि का संहार?

जो भस्म बनेगा आखिर ब्रम्हांड तो ब्रम्हा क्यों रचते हैं
क्यों बार बार इस व्यर्थ परिश्रम से छूटे नहीं बचते हैं?

मैं तो सोच बैठा था की देवताओं का भीषण है पराक्रम
पर देखे तो बनता है उनका जीवन बस है निरंतर श्रम

उत्पत्ति, जीवन और विनाश, ब्रम्हा, विष्णु और महेश
यह सृष्टि है इनकी माया, या इनके नसीब में लिखा है क्लेश

अचरज को मेरी कृपा कर सुलझा दो मेरे गुरूजन
एक उत्तर ऐसा दो कि बस शांत हो जाए विचलित मन

पर ज्ञानी बाबा ने धरा मौन, हर भक्त हुआ उठ खड़ा
प्रवचन हुआ पूरा पर गुप्ता जी के पल्ले कुछ ना पड़ा

घर जाते हुए उन्होंने सोचा

जो देवता की भी हर रचना है व्यर्थ आखिरकार
जो सृष्टि का विनाश होता है बार बार

ऐसे में किसी भी काम का कोई अर्थ है भला जी?
इस सवाल में उलझे चल पड़े चकराए गुप्ता जी

मंदिर की राह में था धूल और धुंध का माहौल
मुह पैट रुमाल धरे गुप्ता जी का खून गया खौल

वो बोले

इस झाड़ू वाले का दिखना ही था अपशगुन का पैग़ाम
जो दर्शन हुए तो भी ना मिला विचलित से मन को आराम

रोज़ धूल उड़ाता है सड़क की न जाने क्यों ये अनाड़ी
जो धूल कल फिर वहीं जमनी है, व्यर्थ है ये दिहाड़ी

और फिर हवा चली ज़ोर से, एक तूफान सा उठा पड़ा
गुंजित हुआ शंखनाद, मंदिर का घंटा बज पड़ा

फूलों की हुई वर्षा, वातावरण हुआ स्वर्ग सा सज्जित
रौशनी हुई दिव्य, धूल का बवंडर हुआ प्रज्ज्वलित

और जैसे ही धूल का बवंडर साफ हुआ
गुप्ता जी ने अपनी ऐनक संभाली

और सामने सफेद दाढ़ी में झाड़ू लिए ब्रम्हा जी खड़े थे !

© 2020 Sreenath Sreenivasan

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