Sreenath Sreenivasan

Thriving Mindfully

Category: Hindi

कागज़ की क़ैद

कागज़ पर खिंची सीधी लकीरें, सलाखों से कम नहीं

कैद हैं इस कारावास में न जाने कितनी कहानियाँ


सलाखें भी ऐसी कि आर-पार कोई सार ना दिखे

और पन्ना पलटें तो फिर कई सीधी लकीरें... 

कई क़ैद नज़्म...कई अनकही कहानियां...



कोरे कागज़, कोरी किताबें, क़ैद कई प्रश्नों के प्रेत

कब छूटेंगे प्राण इनके, कब सींचेगा कल्पना के खेत?



इस सवाल से जूझते हुए तू

कभी उम्मीद में, कभी हताशा में

उन सलाखों के परे छिपे शब्दों की पुकार ढूंढे

सन्नाटे में दूर कहीं जो मद्धम सी लोरी सुनाई पड़े...


जब तलक तेरी सोच झांक कर आज़ादी को ढूंढे

जब छलक कर उफ़ान मारे अभिव्यक्ति की बूंदें

तब कागज़ और कलम की नोक में घर्षण होगा मंद सा

चुप्पी के ताले तोड़े बोलेगा मन मलंग सा



हिचक की हिचकी से बेहतर आखिर

शब्द और स्याही की सरिता

बह जा इस पावन धारा में

 मुक्त कर हर कैद वो कविता


उठा कलम, रचते चला चल, 

मुक्त कर हर क़ैद कहानी

जो स्वर्ग समाए हर सर्ग में, 

अमर हो मानुष की वाणी...




 

एक दर्शन ऐसा भी !

अभी तो सवेरा हुए कुछ ही पल हुए थे
कि गुप्ता जी मंदिर की ऒर चढ़ावा लिए चल पड़े थे

दूर प्रांत से ज्ञानी बाबा आये थे नगर में
भक्तों का तांता लगा था मानो हर डगर में

दर्शन पाने को आतुर आये बाबा की पनाह में
थी कतार ऐसी लंबी पुराने मंदिर की राह में

पर इस मंगल अवसर पर गुप्ता जी ने देखा कुछ ऐसा
कि जैसे कामधेनु के बगल में खड़ा हो काला भैंसा !

गुप्ता जी ने देखा राह पर झाड़ू लगाता एक गरीब
बौखलाए सज्जन की मानो बाहर ही निकल आई जीभ

वो बोले,

सोच था होगा दिव्य मिलन, पर मिला ये झाडुवाला मलिन
इस कलमुहे को झाड़ू लगाना था क्या आज ही के दिन?

अपशगुन हाय अपशगुन, मेरी किस्मत ही है मारी
जो ढूंढता चला ब्रम्हा को और पल्ले पड़ी ये बीमारी

पावन इस अवसर का यह तो रायता फैला रहा है
जो झाड़ू लिए यह भिखारी धूल उड़ाता जा रहा है

इस तरह झाड़ू लगाने का भला कोई अर्थ है?
जो धूल तो कल फ़िर जमेगी, ये काम ही देखो व्यर्थ है !

अरे क्या दर्शन पाने का आखिर उचित है यह काल?
सोच बैठे गुप्ता जी रख कर मुँह पर रुमाल

फ़िर शंखनाद से प्रारंभ हुआ पावन सा प्रवचन
विचलित से शांत हुआ कुछ गुप्ता जी का मन

फ़िर घंटो तक बाबा बोले सभी दिव्य ग्रन्थों का सार
ब्रम्हा विष्णु महेश की लीलाएं अपरम्पार

ज्ञानी बाबा बोले

सैकड़ो बार यह सृष्टि बनी, और सैकड़ो बार नष्ट हुई
यह महिमा मण्डित प्रकृति भी धूल में ध्वस्त हुई

फ़िर उसी धूल से फूटे पुनः जीवन के यह नव अंकुर
फ़िर नारद बोले नारायण और छूटे संगीत के पहले सुर

और इसी तरह बारम्बार चलेगी सृष्टि की अद्भुत माया
यहां देवता भी सर्वनाश से मुक्त नहीं रह पाया

पर पुनः होगी रचना, होगा सृष्टि का नवसर्जन
तू काम में बस राम ढूँढ़, कर हर चिंता का विसर्जन

भावुक होकर गुप्ता जी ने कर तो दिया दंडवत प्रणाम
पर मन में शंका थी एक, भला पूछे कैसे सरेआम?

ख़ैर हिम्मत जुटा कर गुप्ता जी ने पूछा ही लिया

कि बाबाजी उत्पत्ति और विनाश का चक्र पल्ले पड़ता नहीं
जो सृष्टि का एक कण भी सर्वनाश से बचता नहीं

जो तांडव तले कुचलेगा सब तो क्यों रचा ब्रम्हा ने संसार
क्यों झेलते हैं ब्रम्हा बार बार, अपनी ही सृष्टि का संहार?

जो भस्म बनेगा आखिर ब्रम्हांड तो ब्रम्हा क्यों रचते हैं
क्यों बार बार इस व्यर्थ परिश्रम से छूटे नहीं बचते हैं?

मैं तो सोच बैठा था की देवताओं का भीषण है पराक्रम
पर देखे तो बनता है उनका जीवन बस है निरंतर श्रम

उत्पत्ति, जीवन और विनाश, ब्रम्हा, विष्णु और महेश
यह सृष्टि है इनकी माया, या इनके नसीब में लिखा है क्लेश

अचरज को मेरी कृपा कर सुलझा दो मेरे गुरूजन
एक उत्तर ऐसा दो कि बस शांत हो जाए विचलित मन

पर ज्ञानी बाबा ने धरा मौन, हर भक्त हुआ उठ खड़ा
प्रवचन हुआ पूरा पर गुप्ता जी के पल्ले कुछ ना पड़ा

घर जाते हुए उन्होंने सोचा

जो देवता की भी हर रचना है व्यर्थ आखिरकार
जो सृष्टि का विनाश होता है बार बार

ऐसे में किसी भी काम का कोई अर्थ है भला जी?
इस सवाल में उलझे चल पड़े चकराए गुप्ता जी

मंदिर की राह में था धूल और धुंध का माहौल
मुह पैट रुमाल धरे गुप्ता जी का खून गया खौल

वो बोले

इस झाड़ू वाले का दिखना ही था अपशगुन का पैग़ाम
जो दर्शन हुए तो भी ना मिला विचलित से मन को आराम

रोज़ धूल उड़ाता है सड़क की न जाने क्यों ये अनाड़ी
जो धूल कल फिर वहीं जमनी है, व्यर्थ है ये दिहाड़ी

और फिर हवा चली ज़ोर से, एक तूफान सा उठा पड़ा
गुंजित हुआ शंखनाद, मंदिर का घंटा बज पड़ा

फूलों की हुई वर्षा, वातावरण हुआ स्वर्ग सा सज्जित
रौशनी हुई दिव्य, धूल का बवंडर हुआ प्रज्ज्वलित

और जैसे ही धूल का बवंडर साफ हुआ
गुप्ता जी ने अपनी ऐनक संभाली

और सामने सफेद दाढ़ी में झाड़ू लिए ब्रम्हा जी खड़े थे !