Thriving Mindfully

Tag: Poetry (Page 4 of 8)

कलयुग

ये कलयुग है ये कलयुग है यह रोना रोते नहीं थके

अपने पापों का बोझा हम जो ढ़ोते-ढ़ोते नहीं थके

इस भीड़ में भी रीढ़ कहाँ काणों में अंधे हैं राजा

जो स्वार्थ के तलवों तले हम सच कुचल बढ़ते चले



ये साधु सभी ये संत सभी क्यों आँखें मींचे बैठे हैं

मन-परिजन की पीड़ा पर क्यों पर्दे खींचे यह बैठे हैं

कलयुग के कोलाहल में अब करुणा की भी कौन सुने

ईमान की नीलामी से सिक्के हम ऐंठे बैठे हैं



कोई धोबी हो या धर्मराज, लत जुए की सबको है प्यारी

इस अंधकार की वर्षा में हम ढूँढ रहे हैं गिरधारी

नेत्रहीन नृप कईं हुए, देखे हमने धृतराष्ट्र कईं

पर न्याय की यह नायिका क्यों बन बैठी आज गांधारी?



चाहे कलयुग हो या हो त्रेता नारी का हर-पल हुआ हरण

हर राजभवन की छाया तले होता आया मर्यादा-मरण

चीर का एक छोर आज भी है हथेली में तेरी

ज़रा मन टटोल और खुद से पूछ, तू देव है या दैत्य है?



संकट है ये, विकट हैं ये, पर छोड़ना ना तू आशा

पिछले कर्मों पर क्या रोना, है व्यर्थ ये निष्कर्म निराशा

रौद्र राग को त्याग तू भज हौंसले की हंसध्वनि

है दृष्टिकोण का खेल सब चल बदलें कलयुग की परिभाषा



तू स्वयं में ही ढूँढ़ कृष्ण न मूरत को मान बैठ मुरारी

तेरे चित्त की चिंगारी से रोशन हो यह दुनिया अँधियारी

जो हर मानुष ढूँढ ले अपने भीतर दसवाँ अवतार

तो सत्त्व की सरस्वती से तृप्त होगी सृष्टि सारी

PHOTO by Pawan Sharma via Unsplash

इस रात की सुबह कहाँ?

उस शाम, हर बीती शाम की तरह

मैंने सोच को संजोए शाम बिताई
और उस जतन से ही मानो
कुछ सुंदर पंक्तियां उभर कर आयीं

मैंने शब्दों के इस संचय को कागज़ पर उतारा
और उस रात बेशक बड़ी मीठी नींद आई

सुबह हुई तो मैं मेज़ पर ही सोया हुआ था
और कागज़ पर मेरे मस्तक की लकीरें छपी थीं

सूरज चढ़ चुका था, नशा उतर चुका था
और कल की कविता अब कुछ फ़ीकी सी लगने लगी थी

मैंने हताशा में उस कागज़ को मसल कर गेंद बना दिया
और एक भावी रत्न को कूड़ेदान का स्थान दिखा दिया

विचारों के मंथन से कविताएँ हर रात उभर कर आती थी
पर नसीब ही उनका ऐसा
कि सुबह के प्रकाश,
पंक्तियों के प्रकाशन,
से वंचित रह जातीं

फ़िर एक दिन
मैंने मीनार पर चढ़े एक दीवाने को देखा

होगा नाश ज़िन्दगी का जो उसने कोई दायरा न देखा
ऐसी कोई भीड़ नहीं जिसमें उसने मुशायरा न देखा

और बस अंदाज़ में पिरो के शब्दों का पांसा जो उसने फेंका

कि बाज़ार में गूंज उठा मंज़र वाह-वही का
जैसे दीवाने की कविता हो पानी प्यासे राही का

शायद काव्य रस की तृष्णा मुझे उसके मंच तक खींच लायी
भीड़ में उसकी बुलंद आवाज़ मुझे दी सुनाई

पूरे जन-मंडल को कविता आयी बड़ी रास
पर उसकी पंक्तियों को सुनते ही हुआ विचित्र सा आभास

ये कविता मुझे न जाने क्यूं लगी जानी पहचानी
अरे! बेशक ये मेरी कविता है, जो इसने अपनी बना कर सुना डाली !

तालियों से तिलमिला कर मैं घर की ओर भागता चला गया
पहुंचते पहुंचते ही सूरज मद्धम सा ढलता चला गया

कमरे में पोहोंचा, पाया खाली उस भूखे कूड़ेदान को
जैसे हज़म कर बैठा हो मेरे कागज़ की गेंदों को

मैं रोया
फिर सिस्का
फ़िर होश संभाला
और मुस्कुराया

और मदिरा की शीशी को कूड़ेदान का मेहमान बनाया
कलम को थामे मैंने कुर्सी पर खुद को जमाया

और प्रण किया कि यह कलम तब तक चलती रहेगी
जब तक इस रात की सुबह नही होगी…

The music of the wind

If music came through the wind
Each fallen bamboo in the forest
Would hum with a melody
As the breeze tunnelled through its hollows

If music came through the wind
Then each cluster of seed pods
Would chime and rattle
As the wind weaved through the willows

If music came through the wind
Each dreadlock of the banyan tree
Would buzz with a solemn drone
As the draft bowed on a hundred cellos

The wind longs
To make music

And so it blows
In search of a catalyst

To amplify the song in its heart
To carry it along as a psalm

On its endless journey
Through the timeless flow of time

The wind offers the bird
An element of itself
To inhale and exhale
And a song hitches a ride on that ennobled gush

And with this alchemy of breath
There is born a rhythm
As the woodpecker pecks its way home
As the dove coos gently, from a canopy lush

And magically do the hollows of the tree trunk
Have the calfskin sit tight on it once
Do the fallen bamboos find holes punched in
At that perfect distance

And the bamboo is breathed to life
The Djembe is struck to the pulse
Of the pecking bird

And thus is born a movement
A dance
As if unfurled
To the wind of the music
To the music of the wind

The creator is the alchemist
The wind an element
Breath the reaction
Consciousness the catalyst
Music, that golden
Life saving by-product.

Raindrops

We are clouds.
Thick and grey,
brimming with rain,
brimming with potential.

We are aware, that a single droplet we contain
can send ripples of revitalization in a placid pond.
We have the energy to share.

We’ve done it before.
We know this.

Yet, we hover in the skies above.
We look eagerly for a pond to rain into.
But there’s none in sight.

Meanwhile, time elapses.
The wind, and life, not caring for our indecision drift us aimlessly.

We fail to realize that we have to rain down first to create the pond.

But, for once, we decide to act.
To precipitate.

The immutable law of the universe,
gravity, aids us on our journey.

We fear the contact of the Earth,
the impact on the crust, on the rocks,
But we have no choice.

And we rain down without inhibition.

Drops turn into rivulets, and lakes,
ponds, and streams.

Before we know, we become a river,
chiselling the rocks smooth on our advance,
The very rocks we once feared.

And from being a nebula of meek, diffident droplets
We culminate confidently into the might ocean.

We rest in deep satisfaction.

Soon, the sun shines on us.

We rise up as vapor, ready for another challenge,
another downpour,
across the Pacific.

So, I ask you my brooding cloud,
I ask you, my tiny droplet of promise,

‘When are you going to rain down?’

The brotherhood of colours

Once, the colours in the palette entered into a fight
Arguing who among them held dominion over light

Each colour was busy singing its own praises
They came forward one by one to present their cases

The Vainglorious Violet was dressed in its regal pride
He was drunk in his glory, haughty in every stride

Said Indian Indigo, hail ! I colour the scrolls with ink
I’m the blood of books, Every pen’s favourite drink

Said Bubbling Blue, I colour the sky and all the depths marine
I am cool and composed, comforting and serene

Said Glorious Green, look around, I am half of the Earth’s hood
Without me, there won’t be any forests or food

Said Yelping Yellow, of golden ancestry, I am second to none
I drape the world every day with the light of the sun

Said an Ordained Orange, I am the colour of every higher pursuit
Am I not the only colour that’s also a fruit?

Said Raging Red, ‘Stop the Quarrel !’ with all its might
It flashed the danger light to put an end to the fight

‘Who’s the best colour of them all?’ they had to find a solution
The colours entered the ‘prism of peace’ to find a resolution

Tranquil was the arena, from the prism as they emerged
They blended as one light, in harmony they merged

Awestruck they wondered if they’d lost their traits respective
As they joined hands and entered another ‘prism of perspective’

And slowly, from the inverted prism, as they made their way out
The arena dazzled in the light of a brilliant rainbow spout!

And nobody cared finally, which colour had won
As colours joined hands cherishing the spirit of being one !

Why the Ocean dances…

An innocent sand castle celebrates a few moments of gifted existence, before being smoothed out to the ground, grain by grain, as it yields to the unyielding surf of the ocean waves.

But on the other coast far far away, where the tide is still low , another castle in born, cupped together by diligent little builders.
Before too long, this castle will meet the same fate as its cousin across the ocean. It will melt with the chilling advance of an ice cold gush.

Needless to say, another castle will be born somewhere and the ocean wave will rush to lay its reign on it.
And thus the ocean dances, from coast to coast…in a fruitless attempt to win over the resilience of the spirit of a child.

A sand castle materializes whenever it senses the presence of the soul of a child…it’s but nature, for a child to cup the sand…and build. Children are born with the blueprint and with a resolve…

A resolve big enough to make the ocean dance for aeons…

कागज़ की क़ैद

कागज़ पर खिंची सीधी लकीरें, सलाखों से कम नहीं

कैद हैं इस कारावास में न जाने कितनी कहानियाँ


सलाखें भी ऐसी कि आर-पार कोई सार ना दिखे

और पन्ना पलटें तो फिर कई सीधी लकीरें... 

कई क़ैद नज़्म...कई अनकही कहानियां...



कोरे कागज़, कोरी किताबें, क़ैद कई प्रश्नों के प्रेत

कब छूटेंगे प्राण इनके, कब सींचेगा कल्पना के खेत?



इस सवाल से जूझते हुए तू

कभी उम्मीद में, कभी हताशा में

उन सलाखों के परे छिपे शब्दों की पुकार ढूंढे

सन्नाटे में दूर कहीं जो मद्धम सी लोरी सुनाई पड़े...


जब तलक तेरी सोच झांक कर आज़ादी को ढूंढे

जब छलक कर उफ़ान मारे अभिव्यक्ति की बूंदें

तब कागज़ और कलम की नोक में घर्षण होगा मंद सा

चुप्पी के ताले तोड़े बोलेगा मन मलंग सा



हिचक की हिचकी से बेहतर आखिर

शब्द और स्याही की सरिता

बह जा इस पावन धारा में

 मुक्त कर हर कैद वो कविता


उठा कलम, रचते चला चल, 

मुक्त कर हर क़ैद कहानी

जो स्वर्ग समाए हर सर्ग में, 

अमर हो मानुष की वाणी...




 

एक दर्शन ऐसा भी !

अभी तो सवेरा हुए कुछ ही पल हुए थे
कि गुप्ता जी मंदिर की ऒर चढ़ावा लिए चल पड़े थे

दूर प्रांत से ज्ञानी बाबा आये थे नगर में
भक्तों का तांता लगा था मानो हर डगर में

दर्शन पाने को आतुर आये बाबा की पनाह में
थी कतार ऐसी लंबी पुराने मंदिर की राह में

पर इस मंगल अवसर पर गुप्ता जी ने देखा कुछ ऐसा
कि जैसे कामधेनु के बगल में खड़ा हो काला भैंसा !

गुप्ता जी ने देखा राह पर झाड़ू लगाता एक गरीब
बौखलाए सज्जन की मानो बाहर ही निकल आई जीभ

वो बोले,

सोच था होगा दिव्य मिलन, पर मिला ये झाडुवाला मलिन
इस कलमुहे को झाड़ू लगाना था क्या आज ही के दिन?

अपशगुन हाय अपशगुन, मेरी किस्मत ही है मारी
जो ढूंढता चला ब्रम्हा को और पल्ले पड़ी ये बीमारी

पावन इस अवसर का यह तो रायता फैला रहा है
जो झाड़ू लिए यह भिखारी धूल उड़ाता जा रहा है

इस तरह झाड़ू लगाने का भला कोई अर्थ है?
जो धूल तो कल फ़िर जमेगी, ये काम ही देखो व्यर्थ है !

अरे क्या दर्शन पाने का आखिर उचित है यह काल?
सोच बैठे गुप्ता जी रख कर मुँह पर रुमाल

फ़िर शंखनाद से प्रारंभ हुआ पावन सा प्रवचन
विचलित से शांत हुआ कुछ गुप्ता जी का मन

फ़िर घंटो तक बाबा बोले सभी दिव्य ग्रन्थों का सार
ब्रम्हा विष्णु महेश की लीलाएं अपरम्पार

ज्ञानी बाबा बोले

सैकड़ो बार यह सृष्टि बनी, और सैकड़ो बार नष्ट हुई
यह महिमा मण्डित प्रकृति भी धूल में ध्वस्त हुई

फ़िर उसी धूल से फूटे पुनः जीवन के यह नव अंकुर
फ़िर नारद बोले नारायण और छूटे संगीत के पहले सुर

और इसी तरह बारम्बार चलेगी सृष्टि की अद्भुत माया
यहां देवता भी सर्वनाश से मुक्त नहीं रह पाया

पर पुनः होगी रचना, होगा सृष्टि का नवसर्जन
तू काम में बस राम ढूँढ़, कर हर चिंता का विसर्जन

भावुक होकर गुप्ता जी ने कर तो दिया दंडवत प्रणाम
पर मन में शंका थी एक, भला पूछे कैसे सरेआम?

ख़ैर हिम्मत जुटा कर गुप्ता जी ने पूछा ही लिया

कि बाबाजी उत्पत्ति और विनाश का चक्र पल्ले पड़ता नहीं
जो सृष्टि का एक कण भी सर्वनाश से बचता नहीं

जो तांडव तले कुचलेगा सब तो क्यों रचा ब्रम्हा ने संसार
क्यों झेलते हैं ब्रम्हा बार बार, अपनी ही सृष्टि का संहार?

जो भस्म बनेगा आखिर ब्रम्हांड तो ब्रम्हा क्यों रचते हैं
क्यों बार बार इस व्यर्थ परिश्रम से छूटे नहीं बचते हैं?

मैं तो सोच बैठा था की देवताओं का भीषण है पराक्रम
पर देखे तो बनता है उनका जीवन बस है निरंतर श्रम

उत्पत्ति, जीवन और विनाश, ब्रम्हा, विष्णु और महेश
यह सृष्टि है इनकी माया, या इनके नसीब में लिखा है क्लेश

अचरज को मेरी कृपा कर सुलझा दो मेरे गुरूजन
एक उत्तर ऐसा दो कि बस शांत हो जाए विचलित मन

पर ज्ञानी बाबा ने धरा मौन, हर भक्त हुआ उठ खड़ा
प्रवचन हुआ पूरा पर गुप्ता जी के पल्ले कुछ ना पड़ा

घर जाते हुए उन्होंने सोचा

जो देवता की भी हर रचना है व्यर्थ आखिरकार
जो सृष्टि का विनाश होता है बार बार

ऐसे में किसी भी काम का कोई अर्थ है भला जी?
इस सवाल में उलझे चल पड़े चकराए गुप्ता जी

मंदिर की राह में था धूल और धुंध का माहौल
मुह पैट रुमाल धरे गुप्ता जी का खून गया खौल

वो बोले

इस झाड़ू वाले का दिखना ही था अपशगुन का पैग़ाम
जो दर्शन हुए तो भी ना मिला विचलित से मन को आराम

रोज़ धूल उड़ाता है सड़क की न जाने क्यों ये अनाड़ी
जो धूल कल फिर वहीं जमनी है, व्यर्थ है ये दिहाड़ी

और फिर हवा चली ज़ोर से, एक तूफान सा उठा पड़ा
गुंजित हुआ शंखनाद, मंदिर का घंटा बज पड़ा

फूलों की हुई वर्षा, वातावरण हुआ स्वर्ग सा सज्जित
रौशनी हुई दिव्य, धूल का बवंडर हुआ प्रज्ज्वलित

और जैसे ही धूल का बवंडर साफ हुआ
गुप्ता जी ने अपनी ऐनक संभाली

और सामने सफेद दाढ़ी में झाड़ू लिए ब्रम्हा जी खड़े थे !

कर्म और फ़ल

आख़िर फल मुझे क्यूँ मिलता नही
ऐसा रहा हरदम तुम्हारा रवैय्या
पर जो धक्का तुम लगाओ ना सही
तो भला क्या काम आएगा पहिया?

प्रतिभा है तुम्हे भेंट में मिली
पर मेहनत करना है तुम्हारी ज़िम्मेदारी
जो सत्य, सत्त्व और समर्पण मिले
तो साकार होंगी कोशिशें सारी

जो दीप भले तेल से छलके
भीनी सी हो सूत की बाती
जो मन में ज्वाला न जागे
तो कैसे रोशन हो दुनिया सारी?

कस लो कमर, करो तुम परिश्रम
अब पीछे छोड़ो तमस का घेरा
जब कसर रहे न कोई कम
तब ना रहेगा दिया तले अंधेरा

अब उठो और उठाओ तुम्हारा शस्त्र
कलम हो, कुल्हाड़ी हो या हो सितार
बलिदान से संवरेगा हर नक्षत्र
आखिर कर्म से ही होगी तुम्हारी नैय्या पार।

« Older posts Newer posts »